Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 20, 2018 with No comments
शहीद
(उन अमर शहीदों को तो सारी दुनियां सलाम करती है मैं भी करता हूँ लेकिन ये 'लघु कविता' उन शहीदों के लिए है जिनका नाम ही नहीं जानता कोई अलावा उस रब के।
मैं कैसा शहिद हूँ?
दब गया शरीर
मिट्टी के कणों में।
दब गया नाम भी मेरा
मिनटों में नहीं क्षणों में।
मिट्टी के कणों ने दी आहुति
उसी ने संस्कार मेरा किया
मिट्टी ने ही अर्ज करी रब से
कि एक शहीद ऒर *तेरा किया।
*रब का
बिना स्वार्थ के लड़ता गया
छाती तान आगे बढ़ कर।
देश का जज़्बा चरम पे था
सीने में दुश्मन की गोली जड़कर।
ऐ वतन के लोगों ज़रा सुनो
एक दिन मेरा भी मना लेना।
शहीदों का दीप तो हो जलाते
बस एक मेरा भी जला देना।।
-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा

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