September 20, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 20, 2018 with No comments

पर्यावरण

राह चलते ही लड़खड़ा गया पर्यावरण। पास खड़े लोगों में से किसी को कुछ समझ नहीं आया कि आखिर पर्यावरण ऐसे अचानक लड़खड़ा क्यूँ  गया। अच्छा भला चल रहा था।

लेकिन वह अभी लड़खड़ाया ही था चलने में सक्षम था। थोड़ा आगे चला तो पता लगा कि जंगल में कई व्यक्तियों का समूह पेड़ों को काट रहा था।कुछ शहर का कचरा यहां फैला रहे थे।  जैसे-जैसे वो पेड़ों पर प्रहार करते वैसे-वैसे पर्यावरण घायल हो रहा था व कचरे की दुर्गंध भी आने लगी थी पर्यावरण के शरीर से।असामंजस्य में पड़े लोगो को धीरे धीरे घायल होता पर्यावरण इशारा करते हुए कह रहा था कि, ' देखो मेरे घायल होने का का कारण पेड़ काटना है,कचरा फैलाना है।

पर्यावरण की तबियत कुछ ज्यादा ही गंभीर होती जा रही थी।

लोगों ने चलकर उनको लोगों के ग्रुप से पेड़ न काटने व कचरा न फैलाने की गुहार लगाई । लेक़िन नहीं माने । थोडा ओर प्रयास करने पर वो मान गये ।

लेकिन अब तक पर्यावरण घायल हो कर जमीन पर पड़ा तड़फने लगा। वो कहते है न बस 100 फ़ीसदी में से 90 फ़ीसदी खत्म हो चुका था।

थोड़ी देर बाद एक चमत्कार हुआ कि पर्यावरण की तबियत में कुछ सुधार आ रहा था, धीरे-धीरे।

वो हुआ यूँ , शहर के कुछ बच्चों ने ये ठान लिया कि हम इन बड़े मूर्ख लोगों का मुकाबला नहीं कर सकते लेकिन ये जितने पेड़ काटेंगे उतने ही पौधे हम लगाएंगे।
इस तरह तबियत खराब होने में तो थोड़ा ही समय लगा (क्योंकि पेड़ तेजी से कट रहे थे, मैं पौधों की बात नहीं कर रहा हूँ,ज़नाब पौधे से पेड़ बनने में वर्षों लग जाते है ।)
लेकिन ठीक होंने में तो समय लगना ही था।

इस तरह आज भी लोग जब पेड़ काटते है, कचरा फ़ैलाते है और दूसरी ओर कोई पेड़ लगाते है, सफाई अभियान चलाते है तो पर्यावरण की तबियत में उतार- चढ़ाव लगातार आ रहा है।

चिंता का विषय ये है कि पर्यावरण की तबियत में उतार चढ़ाव यूँ ही आता रहा तो हम सब को पता ही है कि पुश-अप कब तक काम करता है । आखिर में थकना ही पड़ेगा। यदि एक बार पर्यावरण थक गया तो उसका उठ पाना लगभग असम्भव हो जाएगा। क्योंकि  पेड़ की कमीं पूरी पेड़ ही कर सकते हैं पौधे नहीं।

इसलिए पयार्वरण प्रेमी बनो... क्योंकि वो हमें निःस्वार्थ भावना से प्रेम करता है।

शुद्ध हवा का झोंका तो सब के मन को भाता है....
                           लेकिन
पर्यावरण बचाने की कसम कोई विरला ही खाता है।
कोई विरला ही खाता है...
-:-स्वरचित-:-
सुखचैन मेहरा


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