September 16, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 16, 2018 with No comments

खुश हूँ अकेला

अब गम नहीं कोई ना तेरे जाने का
ना तेरे आने की खुशी होगी कभी।
खुश हूँ अकेला, जिंदगी की राह में
अब ना आंखों में बेवशी कभी होगी।।

निपटा लूं गा वो सारे बकाया काम
जो मैंने तुम्हारे लिए छोड़ दिये थे।
माफी मांग के सांस लूंगा उनसे
दिल जिनके तेरे लिए तोड़ दिये थे।।

कितना बेरुखी से पेश आता था मैं
तेरे लिए मेरे हरेक चाहने वालों से।
पर तुझे मैंने सरआंखों पे रखा था
न सुनी किसी की  पिछले कई सालों से।

हां सच कह रहा हूँ खुश हूं अकेला
राहत महसूस कर रहा हूँ मैं आज।
मन भी हल्का हल्का सा लग रहा
तुझ से दूर होने की आहट के साथ।।

-:-सुखचैन मेहरा-:-


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