September 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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ऋणी

मन ऋणी तन ऋणी
माँ तेरे उपकारों का।
तेरा ना उतरा मुझ से
उतार दिया हजारों का।

माँ खुदा सा दर्जा तेरा
जानता है जग सारा..।
तेरी महिमा अवर्णनीय
माँ हमारी, भाग्य हमारा।

कर्ज उतारूँ तो उतारूँ कैसे?
कुछ समझ में नही आ रहा
शायद रब भी नहीं जानता
है नही जो हमे सुझा रहा।

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा

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