रात परदेशी (एक नारी अंतरात्मा की तड़फ)
डायरी लिखने में मग्न राज के कानों में एक आवाज पड़ी, ‘बेटा तेरे पापा कहाँ है’ ?? राज ने कोई जबाब नहीं दिया, दुबारा पूछने पर..... उसने बिना पीछे देखे कह दिया, ‘माँ, पापा तो ड्यूटी पर है न अपनी... आपको तो पता ही है.’| फिर अचानक राज को याद आया माँ तो गाँव गई हुई है तो ये कौन है..?
राज ने पीछे मुडकर देखा तो कोई नहीं था वो थोड़ा घबरा गया था |
तुम घबराओ मत मैं तुझे कोई नुकसान नहीं पहुँचाने आयी हूँ |
मैं तो तुम्हें सिर्फ ये बताने आयी हूँ की रात का एक बज रखा है तेरी औरत तेरा इंतजार करती सो गई लेकिन तू अभी तक ये डायरी लिख रहा है|
राम : तो आप कौन हो..(राज ने चारों ऑर नजर घुमाते हुये सहमी सी आवाज में बोला)?
आत्मा : मैं आज से 5 साल पहले इधर पास ही गाँव में किसी गैर के साथ पकड़ी गयी थी तो गाँव वालों ने मुझे गाँव से निकाल दिया और मैंने शहर आ कर रेलगाड़ी के आगे कूद कर अपनी जान दे दी | मेरा पति हमेशा बाहर रहता था| महीनें में दो-तीन दिन ही घर आता था | अब तुम तो लेखक हो तुम्हें तो सब मालूम है कि पति दिन परदेशी हो तो चल जाता है लेकिन रात परदेशी हो तो बुरा हाल हो जाता है एक औरत का।
यही कहने आई थी | आपकी पत्नि को देख मुझसे रहा नी गया और में आ गयी अब मैं हर घर जाकर ये सन्देश दूंगी तू मेरी इस कहानी को लिखेगा ना|
राम : हां जरुर (राज ने जबाब दिया)
अब पता चला वह कोई बुरी आत्मा नी थी एक नारी के अंतरात्मा थी ।
अब डायरी लिखना बंद करके वो सीधा अपने कमरे में गया और उसके बाद से कभी 10 बजे से ऊपर उसने डायरी या अन्य काम नहीं किया |
लेखक: सुखचैन मेहरा सम्पर्क सूत्र: 9460914014

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