September 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on September 26, 2018 with No comments

वो बस्ती

मैं पंजाब गया हुआ था मौसी जी के पास  ।भाई (मौसी का लड़का) कहने लगा चल तुझे शहर घुमाकर लाता हूँ।
मैंने कहा चलो। ( घूमना पसंद नहीं था फिर भी साथ चल पड़ा )
हम चल पड़े। रास्ते में मैं झुग्गी झोंपड़ियों की ओर आकर्षित हो गया।
भाई पीछे से मुझे खींचने लगा, ये गरीबों की बस्ती है..और बहुत गंदगी में रहते है ये लोग ।

(पर मैंने तो जाना था तो जाना ही था...)

वो थोड़ी देर मेरे साथ चला और कहने लगा भाई तूने जाना है तो जा लेकिन मैं इससे आगे नहीं जा सकता।

मैंने कहा ठीक है तुंम चलो मैं आता हूँ...।

मैंने बस्ती में प्रवेश किया। मैं चारों ओर देखता हुआ चले जा रहा था लोग अपना अपना काम निपटाने में लगे हुए थे।

मन में कई सवाल उठ रहे थे। सरकार के वादे यहाँ आकर धूमिल हो जाते है...। हां, भवन बनायें होंगे आपने किसी अमीरों के अपनी योजनाओं से पर गरीब तो आज भी एक तिरपाल के नीचे जीवन यापन कर रहा है...(हां, इस शहर के मंत्रियों के चर्चे भी सुने थे 'बहुत काम करवाया है' लेकिन यहाँ आकर सब गुड़ गोबर हो गया।)
मैं कब बस्ती से आगे, अंतिम छोर पर पहुंच गया पता ही नहीं चला। जहां उनका कोई घर नहीं था शायद कचरा डालने की जगह थी। सच में चारों ओर कचरा ही कचरा फैला था।

एक बच्चे की रोनें की आवाज ने मुझे अपने आप से बाहर निकाला।

(एक बड़ी बहिन भी उसकी जो उसे गोद में बिठाकर चुप करा रही थी और खुद माथे पर हाथ रख कर बैठी थी, थी तो वो 5-6 साल की लेकिन वास्तव में बड़ी लग रही थी...)
मैं उनके पास गया और पूछा कि, 'बेटे ये क्यों रो रहा है. और आप यहां क्यों बैठे हो कचरे में..?

'भूखा है सुबह से खाना देने वाले अंकल नहीं आये आज । हमारा घर तो यही है..हम यहीं रहते है।'

'आपके मम्मी पापा...???'

'नहीं है....'

ये सुनने के बाद मेरा हृदय करूणा से भर गया..आँखें नम हो गयीं। ..क्या बोलता आगे मैं.. बस उन्हें खाना खिलाकर (ख़रीदकर के), उस बस्ती को निहारते हुए लौट आया ।

उस दिन के बाद जब भी मैं अपनी मौसी के पास जाता तो बस्ती वालों के  लिए जरूर कुछ न कुछ ले जाता.

-:-स्वरचित -:-
सुखचैन मेहरा


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