बचपन से शादी तक (दो पक्तियां अनुभव की)
हमारी पहली किलकारी से अपने माँ-बाप को एक नयी आवाज सुनने को मिलती है जिसे सुनकर माँ-बाप ख़ुशी से फुले नहीं समाते | पिता तो अपनी ख़ुशी के इजहार में घर हो तो पूरा घर गूंजा देता है....हॉस्पिटल हो हॉस्पिटल | हमारे जन्म के छः महीनों तक तो माँ-बाप चैन से सोना भी पसंद नहीं करते | जैसे ही हम इस लायक होते है कि हम स्कूल जा सकें तो हमे स्कूल भेजतें है चाहे यह हमारी मर्जी के खिलाफ हों | जब हम अपनी जवानी मैं पैर रखते है तो वे हमारी हर एक प्रतिक्रिया पर नजर रखते है | जैसे हमारे माँ-बाप पर उनके माँ-बाप ने रखी होगी| लेकिन आज कल कुछ माँ-बाप ऐसा करने में अक्षम नजर आ रहे (मैं सभी माँ-बाप की बात नहीं कर रहा)| चलो अब कहानी पर आते है-
सुजल बचपन से अब (किशोरावस्था के अंतिम पड़ाव) तक एक अपने शरारती रबैये के चलते पुरे महोल्ले मैं हमेशा सुर्खियों में रहता था | किसी को धक्का देकर भाग जाना, और लडकियों को तो वह कुछ समझता ही नहीं था जब चाहें कोई न कोई शरारत कर देता | लेकिन एक लड़की को वह कुछ नहीं कहता था | उसकी सहायता करने मैं सबसे आगे रहता था |
एक दिन सुजल पता नहीं प्यार शब्द कहाँ से सिखकर आ गया....? उसने सीधा उसे कह दिया ‘मैं तुम से प्यार करता हूँ’ | ये प्यार क्या होता है....? सुजल ने जबाब दिया- मुझे पता नहीं मेरे बड़े भ@या मेरी भ@भ@ जी से प्य#र करते है और मैं तुमसे | क्यों...? (आश्चर्य से).. चल ठीक है.. इतना कह राशी घर चली गयी और ये बात घर पर भी बताई लेकिन उन्होने हँसी में टाल दिया(सुजल के शरारती रबैये को देखते हुये) | नतीजा यह हुआ कि कुछ सालों बाद उन्होंने भाग कर शादी कर ली |
ये शुक्र है सुजल और राशी को प्यार के रिश्ते का अपनी यौवनावस्था मैं पता चला | यही यदि इन्हें छोटी उम्र में ही पता चल जाता तो क्या नतीजा हो सकता है ये हम सोच भी नहीं सकते । जरा सोचो ऐसा हो जाने पर वह बच्चे बचपन से शादी(21 साल की उम्र) तक पहुँच पायेंगे क्या..? |मेरे कहने का मतलब है छोटी उम्र में ही बड़ी उम्र का काम कर देते। अच्छे अभिभावकों के बच्चे कभी ऐसा नहीं करते हैं | यदि किसी और वजह से ऐसा हो भी जाता है तो मेरी एक और कहानी “दिल-रुबा और जमाना (दो पंक्तिया लव पर )” के अभिभावकों की तरह व्यावहार करें आगे आपकी मर्जी आप मेरे से ज्यादा समझदार हैं|
लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र :- 9460914014

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