Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 08, 2018 with No comments
उस दिन...?
आंखें जब मिली थी उनसे पहली बार मेरी।
बेकाबू दिल ने पहली बार मेरा साथ छोड़ा था।।
कहा अब मैं तेरे लिए नहीं, उसके लिए धड़कूँगा ।
उस दिन मेरी आंखों ने भी, तार उन्ही से जोड़ा था।।
मत पूछो यारो उस दिन आगे क्या-क्या हुआ था।
बस मेरी सांसे चल रही थी, मैं बुत्त बन खड़ा था।।
उनकी काली, कजरारी आंखें दुपट्टे से झांक रही थी।
उसके पिता के 'चलो' शब्द ने, ये सिलसिला तोड़ा था।।
मैं तो कुछ वक्त ऒर ठहर जाता वहां, पर क्या करूँ?
वो यहां से जा चुके थे, बस. कुछ वक्त भी थोड़ा था।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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