Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 17, 2018 with No comments
न जाने कहा गए संस्कार
आज माँ है बेटों पर भार।
न जाने कहाँ गए संस्कार।।
गरीबों पर अमीरों की फटकार।
न जाने कहाँ गए संस्कार।।
छोटे बड़ों पर कर रहे है वार।
न जाने कहाँ गए संस्कार।।
बेटी का जन्म है, दोनों में दरार।
न जाने कहाँ गए संस्कार।।
जहाँ बुजुर्गों का नही है सत्कार।
न जाने। कहा गए संस्कार।।
है रब अर्ज करूं मैं किस दरबार।
ताकि लौट आये फिर संस्कार।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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