December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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परिंदा व शिकारी

परिंदा
है बुद्धिजीवी ज़रा तरस कर
मुझे रिहा कर इस जंजीर से।..
है बुद्धिजीवी ज़रा रहम कर
बाहर निकाल सोच गंभीर से।।

शिकारी
कर्म को कैसे भूलूँ ऐ परिंदे..?
तूने कर्म कर लिया मैं करूँगा।(पिछले जन्म में)
अब डाह ना कर मेरी राह में
शिकारी हूँ शिकार करूँगा

परिंदा
मेरी मान ले एक बात ज़रा..
दम घुट रहा है रे मेरा कैद में।
उन्मुक्त गगन का पंछी हूँ..
क्या तुं रह लेगा छोटे *छेद में?।।

* निहायती छोटा सा घर

शिकारी
नहीं रह पाऊँ, प्राणी कुल का मैं
तूने जान देनी है मैंने जान लेनी।
फिर शिकारी कौन कहेगा मुझे?
छोड़ दूँ गर तुझे, देख तेरी बेचैनी।

परिंदा
तो तुं ज़रा सा तरस नहीं करेगा?
मुझ बे सहारा पर, ज़रा ये बता।
मार देगा किसी के हाथ बेचकर,
ले मार दे अभी मुझे, मेरा सर झुका।।

(उस परिंदे ने अपनी गर्दन शिकारी के आगे।)

शिकारी
कोई अच्छे कर्म किये हे परिंदे.
जो मेरे मन में आ गई है दया ।
जा,  उड़ जा उन्मुक्त गगन में
मानुस हूँ पहले, शिकारी न रहा

परिंदा  : थंक्स (खुशी से)
मनुष्य(शिकारी): वेलकम 😊😊😊
(शिकारी तो रहा ही नहीं बेचारा हार जो गया परिंदे से)

-:-स्वरचित-:-

सुखचैन मेहरा


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