Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 08, 2018 with No comments
सही नहीं है
आज समय नहीं है, अपनो के लिए अपनों को
गैर फिर भी वक्त निकाल लेते है, सही नहीं है।
तरकीबें पूछते है गैरों से वो, हमें लुभाने की
पर हमें इशारा भी नही कर पाते, सही नही है।
हम तो उनकी सादगी पर मरते है मेरे दोस्त
वो चेहरा देखकर प्यार करते है, सही नहीं है।
उनको कोई फर्क ही ना पड़े हम बिलखते रहे
पल-पल याद में भी हम ही तडफें, सही नही है।
कुछ मजबूरियां होंगी उनकी चलो मान लिया
पर पूरे दिन में पल भी बात न हो, सही नही है।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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