December 29, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 29, 2018 with No comments

आओ प्रिया

ओह!  प्रिया  आज तुम  आओ  मोहे  घर
एक अरसा हो गया तुम्हे बतलाया नहीं है ।
बस तेरा  प्यार  पाने को  तरस  रहा  हूँ मैं,
याद में डूबा है दिल, चैन से सोया नहीं है।।

बेवसी  के  आलम  को  समझो जरा तुम
जैसे तड़फ रहा हूँ मैं, तुम्हें  तड़फ नही है?
कैसे हमसफर  हो  तुम जो  बेदर्दी बने हो
विकल रहा हूँ मैं, क्या तुम्हे फर्क नही है??

ये दिल बस तेरे ही बारे सोचता रहता है
क्या तेरा  दिल मेरे बारे में नही सोचता।
बस पल-पल तेरी ही याद में तड़फता है
क्या तेरा दिल मेरे लिए नही तड़फता।।

ओह! प्रिया अब बस बहुत हो गया है 
इस बेसमझी के  दौर को टूट जाने दो ।
तेरे तन से ज्यादा तेरी रूह की जरूरत है
रोको मत अपने आप को आ जाने दो।।

मिलेगा सुकून तेरे  पास आ  जाने से ही
आ जाओ अब तुम इतनी देर न लगाओ।
हा, दे रहा ये बेकरार दिल आवाज तुम्हे
अब तुम जहाँ भी हो तुरन्त चले आओ।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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