धरती माँ
क्या हुआ धरती माँ ???
कुछ नही बेटा...
फिरी तेरी आंखों में आंसू कैसे?
बस ऐसे ही निकल आये बेटा...
फिर भी कुछ तो बात होगी।
चल ले फिर सुन बेटा...
हा.... माँ (ध्यान लगा मैं सुनने लगा)
आप लोग मुझे माँ कहते हो ना??
हा, माँ....कहते है
तो फिर क्यों वन क्यों काट रहे हो
मेरे शरीर के अंगों को क्यो आपस मे बांट रहे हो.?
कई किसान तो पराली को जलाते है
मेरे सीने में आग लगाते है
ले सुन अब...कुछ लोग मुझ पर
कूड़ा करकट फेंकते है।
जहा जी किया वहा फेंकते है।
ट्यूबेल लगाकर मेरा सीना छलनी करते है
इस तरह मुझे चोट पहुँचाते,
लोग मनमानी करते है ।
अब तू बता क्या करूँ मैं ?
रोने के अलावा कुछ कर भी नही सकती।
ओह! माँ आँखो में नीर बह आया है
तेरी दुखदायी कहानी सुनकर
अपने आप को जगाया है
जितना होगा मैं करूँगा
माँ तेरी इस कहानी का
प्रसार जन जन तक मैं करूँगा।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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