दिलरुबा फिर से: भाग 2
सच बताऊं तो मैं रुबा को चाह कर भी भूला नहीं पा रहा था।
ऊपर से वो किताब में छिपाया हुआ 'रेड रोज' आज अचानक मेरे सामने आ गया। तब तो मैं रो ही पड़ा था।
राशि का संदेश आया लेकिन मैंने नहीं देखा, मेरा मन तो बस रुबा के बारे में ही सोच रहा था।
फिर एक दिन राशि का फोन आया कि 'मेरे माता पिता को राशि के माता पिता ने शादी की तारीख पक्की करने के लिए बुलाया है'
मैंने अपने माँ-बाप को बता दिया वो अगले ही दिन शादी पक्की कर आये।
दो महीनों बाद हम दोनों को शादी के बंधन में बंधने वाले थे ।
अब मैं ये फैंसला ले चुका था कि अब कभी भी रुबा से बात नहीं करूंगा अपने वर्तमान हमसफर के साथ खुश रहूँगा..
रुबा के मैसेज पर मैसेज आ रहे थे लेकिन मैंने रिप्लाई नहीं किया
मुझे राशि से बात करना अच्छा लगने लगा । लेकिन मेरी बात राशि से होना धीरे धीरे कम होने लगी। मैं तरसने लगा राशि से बात करने के लिए।
मैन राशि को पूछा कि मुझ से बात क्यों नहीं करती?
उनका जवाब था घर का काम बहुत है और पापा से फ़ोन का भी मिलना बहुत मुश्किल है ।
एक दिन मैंने राशि को बाजार में मिलने को कहा। वो आ गई।
लेकिन वो मुझसे मिलते ही रोने लग गयी....मैंने पूछा "क्या हुआ???"
वो कहने लगी...'मैं किसी और से प्यार करती हूँ...'
मैंने कहा "तो उसमें दिक्कत क्या है? मैं मना कर देता हूँ'
शादी की दिनाँक पक्की हो चुकी है कार्ड भी छप चुके है ...
फिर क्या हुआ...मैंने कहा
कुछ नहीं होता यदि अपने दोनों की शादी हो भी जाये तो क्या तुम मुझे उस लड़के जितना प्यार दे पाओगी...
नहीं.... राशि ने सर् हिलाते हुए कहा।(आंखों में आंसू है)
इस लिए कह रहा हूँ पहला प्यार पहला ही होता है उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए...
अब मैं उससे(उमंग) बात नहीं करना चाहती क्योंकि मेरे माता पिता की इज्ज़त का सवाल है...राशि ने कहा
'देख लो फिर मत पछताना...'मैंने कहा
'नहीं, तुम भी बहुत अच्छे हो...'राशि ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा
अब मैं तुम से रोज बात किया करूंगी...वो किसी ने सच ही कहा है कि 'जिसे हम हासिल करना चाहते है उसे अगर न हासिल कर पाए तो जो हासिल हो गया है उसे कभी नही गवाना चाहिए।'
अब मैं तुझे गवाना नहीं चाहती हूँ...
अब हमारी तो बात बहुत अच्छे से होने लग गयी लेकिन दूसरी तरफ रुबा के पेरेंट्स को मेरे और रुबा के प्यार के बारे में पता चल गया।
उन्होंने एक बार मेरे माता पिता जी को मिलने का फैसला लिया। लेकिन जब वो मेरे पेरेंट्स से मिलने आये तो वो दिन बदकिस्मती से मेरी और राशि शादी का दिन था..
वो लोग यहां से जाने लगे लेकिन मैंने उन्हें थोड़ी देर और रुकने को कहा। और मेरे पापा से मिलवाया।
सब लोग खुश थे एक मेरे और रुबा के पेरेंट्स के अलावा।
चारों ओर खुशियों का माहौल था।
राशि को प्यार करने वाला लड़का उमंग वहां पहुंच गया।
पहुंचते ही वो राशि के पिता को साइड में ले जा कर उनके पैरों में गिर गया और सारी बात सच-सच बता दी।राशि का पिता ने उसे उठाया।
रुबा के पापा ने उन्हें देख लिया।
थोड़ी देर उन्हें बात करते देख रुबा के पिता जी भी वहीं चले गए और मेरी व रुबा के बारे में भी सब कुछ बता दिया ।
सयोंग से मेरे पापा भी उनमें शामिल हो गए।
यहां तीनों परिवार (मेरे, रुबा व राशि के) के मुखियाओं ने रुबा की शादी मेरे साथ तथा राशि की शादी उमंग के साथ करने का एक सराहनीय निर्णय लिया।
उमंग, शादी लिए तैयार हो रही राशि के पास चला गया।
राशि घबरा गई... तू यहां क्या करने आया है? तुम्हे किसने बुलाया यहाँ ?
पापा को देख और ज्यादा घबरा गई... पापा आप जहां मेरी शादी करोगे में वहीं शादी करूंगी..
पक्की बात है ..? पापा ने कहा।
पक्की....पापा (रो कर पापा के गले लगते हुए)
तो तेरी शादी उमंग से करवा देता हूँ और तुझे करवानी पड़ेगी।
राशि हस पड़ी।
उमंग मैंने तो तुझे कभी नही बताया कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ... फिर...
रोजी ने बताया था...
इस प्रकार दिल व रुबा तथा राशि व उमंग एक हो गए ।
किसी ने सच ही कहा है प्यार अगर सच्चा हो तो उसे खुद भगवान भी नहीं अलग कर सकता है...
"दिलरुबा फिर से: भाग 1", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
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स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014

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