Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on December 29, 2018 with No comments
दिल की सौदेबाज़ी
आज उन्होंने मेरे दिल की सौदेबाज़ी की।
कहा, दौलत के बदले ये दिल तेरा हुआ।।
गरीबी का हवाला दिया, पैसे देखे नही है।
दौलत के बदले ही उनका दिल मेरा हुआ।।
मानता हूं कि आज की जरूरत है दौलत।
पर, दौलत की रात का कब सवेरा हुआ।।
मेरा दिल कोई बिकने का समान नही है।
जो दौलत के सौदे मात्र से तेरा हुआ।।
प्रेम की दौलत कमा कर देखो कभी तुम।
भूल जाओगी दौलत जब 'चैन' तेरा हुआ।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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