December 31, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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दो अनजाने अजनबी

दो अनजाने,  अजनबी  जा  रहे  थे आज  मिलने।
दिल में अजब सी बेचैनी, अजब सी व्याकुलता है।।

निगाहें  सजनिया  को ढूंढ  रही थी, प्रणाम  करते हुए।
दिल  और  दिमाग, जहन  की तरंगें, आह!  भरते हुए।।

कामयाब  हुई  निगाहें  उसे ढूंढ़ने में , मैं होश खो बैठा।
उसका  नूरानी  चेहरा  देख, दिमाग  मदहोश हो बैठा।।

हां,माँ की चिमटियों से मैं सम्भल रहा था थोड़ा-थोड़ा।
दूसरे ही पल देखने पहुंच जाता उसे, मन दौड़ा-दौड़ा।।

बड़ो के लव हिलते दिखाई दे रहे थे, कर्ण सुन न रहे थे।
ध्यान तो वहीं था मेरा लव मेरे हां,हूं में जवाब  दे रहे थे।।

व्याकुल हो उठा था मेरा मन उसे अपने सामने न पाकर।
फिर चाय लाती देख सुकून मिला दिल को अब जाकर।।

हम व्याह बंधन में बंधने जा रहे है बस शेष है कुछ दिन।
सोचा न  था ये 'चैन'  इतना  बेचैन हो जाएगा इक दिन।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा 'चैन'


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