December 13, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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शहीद पतवार

एक दिन, मरम्मत   के   बहाने।
अलग की थी, पतवार नाव से।।

जगह ली  थी  पतवार  नयी  ने।
मल्लाह ने स्वीकार था, चाव से।।

कोने में लगी वो  पुरानी पतवार।
जूझ  रही  थी, बस  तनाव   से।।

डूब  गई वो  नाव भी  वियोग  में।
उस पुरानी पतवार के अभाव से।।

है  मल्लाह!  क्यो  अलग  किया?
बता, हमें एक दूजे के जुड़ाव से।।

बता   क्या  मिल   जायेगा   तुझे।
है  मल्लाह,   हमारे  अलगाव से।।

माफ करो  मुझ मूर्ख, अज्ञानी को।
बोला   मल्लाह,   क्षमा   भाव से।।

कैसे  ले  लूं मैं  तेरी  जगह, बहन?
गिर गई  खुद, अलग  हो नाव से।।

शहीद पतवार आंखे नम कर गई।
पर मिला गई पतवार को नाव से।।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014


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