Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on January 30, 2019 with No comments
[1]
फूल व कांटे
दोनों साथ रहते
मिल न पाते
[2]
है बेखबर
क्यों कली की नजर
कांटे का फिक्र
[3]
पुष्प है मोहि
कांटे का जिक्र नहीं
क्या है ये सही?
[4]
वर्षों से आज खोल बैठा कॉलेज की किताब।
आंखे नम हुई, देखा जब मैने सूखा गुलाब।
[5]
खोली किताब।
आया सैलाब
सूखा गुल
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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