January 17, 2019 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on January 17, 2019 with No comments

निकल गया हूँ
तेरी तलास में ओ! हमसफर,
न जाने तू कहा मिलेगा।
तू मेरी खामोशी को पढ़ लेना,
तू मेरे गुस्से के पीछे छिपे प्यार को पहचान लेना।
और कुछ नही चाहिए मेरे हमसफर तुझ से
बस मेरी खुशी में छिपे गम को पहचान लेना।
मैं भी तेरी खुशी को हर तरह से ख्याल रखूंगा
बस हर धूप-छांव में मेरे साथ खड़े रहना।
और जो मैं तुम से चाहता हूँ
वो सब मैं खुद भी करूँगा ।
क्योंकि हर किसी को हमसफर से
यही उम्मीदें होती है ।
मैं भी तो तेरा हमसफर होऊंगा।
पर तलाश तो अब भी जारी है,
खत्म हो जाएगी ये तलाश
तेरे मिल जाने से मेरे हमसफर,
बस तेरे मिल जाने की बात सारी है
लो खत्म हो गई है ये तलाश
मैं मेरे अंदर छिपे हमसफर को
मैं ही हूँ खुद का हमसफर।
क्योंकि खुद से बढ़कर आपका हमसफर
कोई...........नही......…..है.........
लेकिन एक हमसफर और चाहिए ,
जो खुद से भी बढ़कर हो...
कल से उसकी तलाश में निकलूंगा।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


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