Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on January 15, 2019 with No comments
तेरी आंखों का नूर
तेरी आंखों ने शरारत करनी शुरू कर दी है।
मैंने दिल को काबू में रहने की नसीहत दी है।।
तेरी आंखों को ना देखे कभी नजर उठाकर।
कहां जाओगी मेरे सिवा दिल को तसल्ली दी है।।
एक बार झांककर देखा था तेरी आँखों में मैंने।
तब से तेरी नजरों ने मुझे एक तड़फ सी दी है।।
अब चरम पर है मेरी तड़फ का बेकाबू दौर।
पर तेरी मर्यादित मुस्कान ने, सयंम शक्ति दी है।।
तेरी आंखों के नूर को बरकरार रखना मेरे सनम।
हम जल्दी तेरे होने वाले है पंडित ने तिथि दे दी है।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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