Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on January 17, 2019 with No comments
कभी सास तो कभी बहु है बेटियां
न जाने कुछ लोगों को
क्यों खटकती है बेटियां।
लोग इन्हें परेशान क्यों करते हैं?
जहां 'कन्या दान महाकल्याण'
के उदघोष है लगते,
क्यों भ्रूण कचरे में मिलते हैं?
कलेजे का टुकड़ा है बेटियां
न जाने लोग इन्हें कैसे दान करते है?
शर्म से झुक जाए सर् इंसानियत का
न जाने क्यों लोग ऐसा काम करते है?
खुद दान बनकर, धन्य करती उस घर को
जहां माँ बाप उसे विदा करते हैं।
रूप देवी का होती है बेटियां,
फिर न जाने क्यों लोग
इन्हें जन्मने से डरते है।
(शिक्षा कथन)
कन्या दान से बड़ा कोई दान नहीं है
जो बेटी को न चाहे वो पशु है इंसान नहीं है।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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