कली और कांटा
कली
आज समझ मे आया तेरा प्यार रे कांटे,
सबको दर्द देकर मुझे तू खुशियां बांटे।
कांटा
देर आये दुरुस्त आये, आप हमें समझ पाए।
बेइंतहा मुहब्बत करता कैसे तुझे कोई तोड़ ले जाए।
कली
फिर तूने जाहिर क्यो नही किया रे कांटे ?
अपने दुःख सुख तूने मेरे संग क्यो नही बांटे?
कांटा
डर था तुझे चाहने वाले तो हजारों है कली।
पर लोगो के आगे मेरी आज तक नही चली।
(कहने का मतलब है फिर भी लोग कली को तोड़ ही लाते है उससे अलग कर ही देते है।)
कली
अरे तू एक बार कहता तो सही मेरे हमदम।
लज्जाई रहती हूँ तेरे स्पर्श से मैं हरदम।
कांटा
चलो ठीक है अब तो हमारे हो जाओ सनम।
मेरे एक और स्पर्श से खिल जाओ सनम।
कली
चलो आओ दुनियां से कहीं दूर चलते है हम।
आज रूहानी स्पर्श ने मदहोश किया है सनम।।
लेखक कथन
आज वो दुनियां से दूर, है पानी के अंदर।
तब तक महफूज रहेंगे जब तक है समंदर।।
स्वरचित
सुखचैन मेहरा

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