Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on June 19, 2018 with No comments
बदकारी (एक बे इलाज बीमारी)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना*
नोट : बदकार औरतां अते मनचले नर इस कहानी नूं ना पढ़न वे मौत मारे जावों गे
आज कल व्याह तो पहला हरेक मुंडे कुड़ी नूं
एक अजीब जही चिंता खान लग पई है कि उस दा होण वाला हमसफ़र किस तरहां दा होवेगा, की
उसदा नेचर होवेगा | किते मुंडा मनचला ना निकल जे, किते कुड़ी बदकार ना निकल जे |
स्वाभिक जही गल है कि आजकल जो दुनियां च हो रिहा है उस नु देख के हरेक मुंडे कुड़ी
दे जहन विच आ गल आ ही जांदी है – ऐसी ही इक काल्पनिक कहानी में तुहानू आज दसन जा
रिहा हां, जरा गौर फरमायो –
रात दे 12 बजे दा टाइम सी
हजे हुनी पड़ोसियां दे ज्वाक इहना दे करों टीवी वेख गये सी ते | जीवे ही ज्वाक घरों
निकले ते उस स्त्री ने अपने ज्वाका नु स्वा दिता | एक डेड घंटा अपने बच्यां दे सोन
दा इंतजार कर दी रही | हुन इंतजार दी घड़ी भी ख़त्म हो चुकी सी क्योंकि ज्वाक सो
चुके सी | उसने अपने पड़ोसी नु कंद उतों दी हाक मरके बुला लिया ते अपने पति नूं
उहना दे करे लगये ते मुहं च कपड़ा दब के जहर पिला दिता| उस बदकार औरत ने अपने जीवन
साथी दी हत्या करवा, ते अपने ही घर दी छत ते पोड़ियाँ उतो दी कड़ीस के छड आंदा|
सवेरे मगर मच्छ दे आंसू रोवे |
हुन तुसी दसो अवे दी बदकार नारी नूं या उस
दे मनचले पड़ोसी नर नूं जियोन दा हक़ है या नहीं |
लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र : 9460914014

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