June 11, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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               बुरा वक्त (परीक्षा की घड़ी)

अतिशा (छोटी सी बच्ची) सुबह-सुबह बाहर से खेल कर दौड़ती हुई अंदर आई | अंदर आते ही उसने अपनी माँ से खाना माँगा | माँ को पता था कि आज कुछ खाने को नही है, फिर भी वह रसोईघर में गयी और आटे के खाली ढोल को देखकर अपनी आँखों में आंसू भर आई|
माँ को रोते देख अतिशा बोली, ‘माँ तूं रो क्यूँ रही है..?’ माँ ने जबाब दिया बेटा कुछ नहीं बेटा थोड़ा सा सर दर्द है | ठीक है माँ मैं अपने आप खाना ले लेती हूँ और आकर तुम्हरा सर दबा दूंगी अभी तो बहुत भूख लगी हुई है | वह रसोईघर में जाती है पहले तो ढ़ोल में, फिर इधर-उधर देखती है, जब खाना कहीं भी नजर नही आता तो वह अपनी माँ के पास वापस जाती है | जाकर कुछ बोलती इससे पहले माँ के आंसू ऑर तेज हो जाते है |
अच्छा ठीक है खाना नहीं देना मत दे माँ ... |
मैं स्कूल(आंगनबाड़ी) में जाकर खा लुंगी पर तूं रो मत माँ ..| अतिशा की ये बात सुनकर उसकी माँ उसे गले लगाकर फुट-फुटकर रोने लगी|
बस कर मेरी बच्ची, अब बस कर..... |  आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि घर में कुछ खाने के लिए न हो | इतने में दरवाजे की घण्टी बजी। अतिशा की मां ने अपने आंसू पोंछ कर दरवाजा खोला)
एक औरत सामने थी । वह अंदर आयी और कुछ पैसे उसकी माँ के हाथ में थमा दिए | पूछने पर पता चला कि उन्होंने करीब एक साल पहले उन्हें एक सूट सील के दिया था |  ये उसी के ही पैसे थे |
अब अतिशा की माँ खुश थी | 

अतिशा अपनी माँ को खुश देख कर कहने लगी, 'माँ आपका सर दर्द सही हो गया.....?' | 

'हाँ, मेरी बच्ची सही हो गया|' मां ने मुस्कराते, उसके बाल सहलाते हुए कहा।

इस तरह इनका ये बुरा वक्त गुजर गया|

बुरा वक्त तो किसी पर भी आ सकता है |
किसी का जल्दी तो किसी का देर से बीत जाता है |

लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र : 9460914014


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