Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on June 12, 2018 with No comments
नौकर (कुछ होते है ख़ास)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना*
हे! इधर आ यहाँ ये मेज कौन तेरा बाप साफ करेगा ? सुबह सुबह मेरे कानों
में ये बात पड़ी | अच्छा नहीं लगा | फिर वो बेचारा आया और चुप-चाप मेज साफ करने लगा
| अरे! रामू कहाँ मर गया तूं..? इधर आ | इतने में चाची आई और बोलने लगी अभी तक मेज
साफ ही कर रहा है | इस बीच बेचारा चाचा जी का जबाब नहीं दे पाया उनसे भी सुननी पड़ी
| मैंने रामू से कहा... रामू, पढ़े लिखे मालूम होते हो तो फिर ये सब क्यों?
वो: भाई
मेरा नाम सुजल है पापा बीमार है तब मैं आया था उनकी जगह | लेकिन कल से मैं ना खुद
आऊंगा ना ही पापा को आने दूंगा (सुजल ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा | दो तीन दिन जब चाची जी को काम करना पड़ा तब उसे
उस नौकर की कमी महसूस हुई | उसके बाद रामू जी के ठीक होने के बाद बुलाया और
दोबारा काम पर रख लिया | उसके बाद कभी बतमीजी से बात नहीं की | ऑर तो ऑर उनके काम
थोड़ा थोड़ा हाथ भी बंटाने लगे |
कोई
नौकर गुलाम नहीं होता ख़ास होता है जो आपके किसी भी प्रकार के समय में खुशियों के
रंग भर देता है |
लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र : 9460914014

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