August 01, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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आओ बैठो ज़रा पास मेरे

आओ बैठो ज़रा पास मेरे, कुछ फुरसत के पल निकालकर ।
करो इक़रार जो दिल में छुपाया है,  बाहों में बाहें डालकर।।

हां, कुछ तन्हा दिल को चैन की सांस मिले, कुछ ऐसा सुनाओ।
जिसमें दिखे तेरी ही सूरत बस एक ऐसा, आईना बन जाओ..।।

हम दोनों की महफ़िल को कुछ, इस तरह से महका दो।
दिल का रोम रोम खिल उठे, बस ऐसा गीत गुनगुना दो।।

घोल दें सांसों की सुगंध इक दूजे में, पर मर्यादा में रह कर ।
बस अब और नहीं जिया जा रहा बिन तेरे,  रह-रह कर।।

सब ऐबों को छोड़ दिया है, मैंने बस एक तेरे लिये।
तौबा कर चुका हूं सब गुनाहों से, जो मैंने थे किये।।

क्यूँ साथ निभाने से कतरा रहे हो, कुछ अच्छा नहीं लग रहा।
तेरी ख़ामोशी  को देख  मन मेरा, बुझ तो कभी जग रहा।।

(मुझे यूँ विखलाता देख आखिर मुस्करा ही उठी पगली शायद अच्छा लगता है उसे मुझे यूँ सता कर)

छोड़ दो सताना मुझे मेरे हमदम, दूरियाँ बढ़ जाएंगी।
चलो छोड़ो इन सब बातों को, तो शाम ढल जाएगी।।

भूला देता हूँ हर शिकवे अक्सर, तेरी इस हसीं मुस्कराहट के साथ।
मदहोशी की सी हालत  हो गयी है, करीब होने की आहट के साथ।।

सुखचैन मेहरा
#9460914014


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