August 15, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on August 15, 2018 with No comments

मैं दो दिन का परिंदा


मैं दो दिन का परिंदा 
जाऊंगा मार उडारी
हो जाऊंगा शिकार किसी का
मेरा  मिल गया  है शिकारी

आओ दो पल बैठो पास मेरे बस
ताकि सांसे ज़रा आराम से निकले ।
अंत समय को यूं ख़ुशनुमा बना दो
रब का नही बस तेरा ही नाम निकले।।

बीमार हो गया हूँ तेरी याद का
पल पल दम घुट रहा है मेरा।
अब कैसे बीत रहे है दिन मेरे ??
ये तो रब ही जानता है मेरा।।

शायद जब तुम लौट कर आओ
तो घर में भीड़ मिले लोगों की ।
या गुहार लग रही हो मेरे लिए
फ़बी, व्हाट्सएप पे सहयोगों की।।

लौटना हो तो देर मत करना
कहीं मैं मिट्टी में न रच जाऊं
अब बच पाना है मुश्किल मेरा
तेरे आने से शायद बच जाऊं।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


0 comments:

Bookmark Us

Delicious Facebook Favorites More Stumbleupon Twitter

Search