August 04, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on August 04, 2018 with No comments

क्या बात है ? आंखे भी चुराने लगे हो।

पहले जैसी बात नही करते हो महबूब
क्या बात है ? आंखे भी चुराने लगे हो।
जिस गली से हम गुजरते हैं अक्सर
क्यूँ तुम गली दूसरी अपनाने लगे है?।।

शायद किसी ओर ने जगह बनाली है
तुम्हारे दिल में, जो हमें भुलाने लगे हो।
क्या हुआ आज कल हमसे पहले ही
इंतजार किये बिना कॉलेज आने लगे हो।।

पहल तुमने ही की थी मैंने नहीं फिर
क्यूँ खुद ही हाथ से हाथ छुड़ाने लगे हो ।
मुझ से कुछ गलती हुई है तो बताओ तुंम
यूँ चुप रहकर क्यों तड़फाने लगे हो ।।

खा जाएगी तेरी ये खामोशी कसम से
ने जाने क्यूँ आप हमें यूँ सताने लगे हो।
कुछ तो बताओ कि क्या कारण है जो
आप हमसे मिनतें करवाने लगे हो ।।

चलो खुश रहो, आबाद रहो, जहां भी रहो
आप हमारे दिल से भी धूमिल हो रहे हो।
लेकिन मिटो गे नहीं दिल से कभी, वादा है
बस आपके मान जाने तक दूर जा रहे हो।।

सुखचैन मेहरा # 9460914014


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