August 26, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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मेरी बहना


रक्षा बंधन का दिन शाम में बदलता जा रहा था, लेकिन मेरी कलाई अभी भी सुन्नी ही पड़ी थी। और आज तो में कहीं बाहर भी नहीं गया क्योंकि पिछली बार मेरी मैं कहीं बाहर चला गया था तो बहन मेरा पूरा दिन वैट करने के बाद शाम को अपने ससुराल वापस लौट गई थी। मुझे वो राखी अपने आप मेरी कलाई पर बांधनी पड़ी थी।
आज भी पूरा दिन बीत गया लेकिन कोई बहन नहीं आयी मुझे राखी बांधने को । क्योंकि मेरी खुद की बहन तो है ही नहीं थी ना...। मैंने अपनी माँ से कहा, 'मां आज रमन(मेरी चचेरी बहन) आयी नई क्या हुआ?? कोई बात हुई क्या उससे आपकी.?।
"मां बोली- नहीं बेटा नहीं कोई बात नहीं हुई।"
"मां, आज भी लगता है मेरी कलाई फिर से सुन्नी रह जायेगी..."(मैंने अपनी आंख नम करते हुए कहा)
रात के आठ बज गए थे, अब तो सारी आस ही खत्म हो गयी थी।  मैं निराश होकर गार्डन में घूमने चला गया। रास्ते में एक शोर सुना...मैंने आगे जा कर देखा कि एक लड़की लड़के की पिटाई कर रही थी..। कारण था उस लड़के ने उसे छेड़ने की कोशिश की थी। काफी देर से पीछे पीछे घूम रहा था।
मैंने पुलिस को फोन कर उस लड़के को पुलिस के हवाले कर दिया।
आप ने उस लड़के को कैसे पिट दिया जबकि वो लड़का तुम्हारे से दो गुणा ज्यादा ताकत रखता है। मैंने उसके टूरिस्ट बैग को पकड़ते हुए कहा...उसने पहले तो मना किया लेकिन फिर मान गयी।
कुछ नहीं भाई... वो......
(मैंने उसे इतना ही बोलने दिया।)
क्या कहा तूने भाई.... भाई कहा तूने मुझे.. कब से काम तरस गए थे मेरे ये शब्द सुनने के लिये।
उसने आश्चर्य से कहा "हां.. मैं सब भाई ही कह कर पुकारती हूँ क्योंकि मेरा कोई भाई नहीं है" उसने  आहुका भरते हुए कहा
तुंम मुझे राखी बांधोगी...? मैंने उत्साह से पूछा।
"हां,पर मेरे पास राखी के लिए के लिए खुले पैसे नहीं है। मैं अभी यहां (जयपुर) आयी हूँ मेरी पोस्टिंग हुई है यहां टीचर की ।" उसने कहा।
तेरा हैंकि ही बांध दे एक बार...उसने बांध दिया ।
"अब कहां रहोगी यहां..?"

"देखती हूँ कि स्कूल की तरफ से कोई कंपार्टमेंट मिलता है तो..."

तुंम बुरा ना मानो तो हमारे घर रह सकती हो..।

"ठीक है...जितना किराया होगा तुझे दे दूंगी। वैसे आपका घर कहाँ है...."

"सरकारी स्कूल में पास ही है ।"

अरे मेरा भी तो वो ही स्कूल है।

और मुझे पैसों की जरूरत नहीं है सिर्फ एक बहन की जरूरत थी वो आज पुरी हो गयी ।
हम घर चले गए । मां को सारी बात बताई । मां ने इजाजत दे दी।
वो नहाई धोयी इतने में मैं राखी ले आया और उसने मुझे बांध दी (रक्षा बंधन वाली रात दुकानें देर रात तक खुली रहती है।)
फ्री होने के बात मैंने उससे मजाक करते हुए कहा," तुंम कभी नहाती नहीं हो क्या..??बदबू आती रहती है।
रोज नहाती हूँ... झंडु तू नहीं नहाता होगा...। (आज से ही हमारा झगड़ा शुरू हो गया। जैसा अमूमन होता है भाई बहन के रिश्ते में।)

इस तरह मुझे बहन और उसे एक भाई मिल गया। इस दिन के बाद मेरी कलाई कभी सुन्नी नहीं रही। सुबह सुबह ही एक राखी मेरी कलाई को शृंगार बन जाती...

लेखक: सुखचैन मेहरा # 9460914014


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