Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on April 30, 2018 with No comments
सोच अपनी-अपनी (मेरी अभिव्यक्ति)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ें*
मैं और मेरा दोस्त बस स्टैंड पर खड़े
बस का इंतजार कर रहे थे | इतने में एक बस आयी जिसके पीछे लेखा हुआ था कि 'सोच अपनी-अपनी' | जिसे पढ़ मेरे दोस्त ने कहा सही लिखा है यार... मैंने भी कह दिया हां भाई सही है |
लेकिन अपनी सोच अपनी हैं कहाँ... हम तो आजकल परिस्थितियों को देखकर ही अपनी सोच
बदलने लगे है|
वो कैसे.....?(मेरे दोस्त ने खास
लहेजे में पूछा)| देख भाई अब ध्यान से सुनते जाना जो कुछ में कहने जा रहा हूँ ......
किसी के घर के आगे से पक्की सड़क बन जाती है तो वह सोचता सरकार बहुत
अच्छी है, हर गली महोल्ले में सड़कें बना रखी हैं अबकी बार तो चमन ही बना दिया पुरे
शहर को सरकार ने..| दूसरी ऑर जिनके यहाँ सड़क नहीं बनती है तो वह सोचता है
यार कुछ नी करवाया अबकी बार सरकार ने... | इसी तरह किसी का कर्जा माफ़ हो जाये और न
होए तो भी दोनों की सोच में भिन्नता आ जाती है | भाई.....जिस दिन सोच अपनी, अपनी
हो गई न तो लोगों का सोचने का नजरिया बदल देगी | लोगों ने इस लाइन का मतलब
अन्यत्र निकल लिया है यथा- सोच अपनी अपनी* | भाई सोच तो डॉ अबुल पाकिर
जैनुल आबेदीन अब्दुल कलाम जी की थी जिन्होंने अपने देश के लिए कुछ कर दिखाया |
बस आ चुकी थी हम चले गये लेकिन वहां खड़े
लोग जो हमारी बातों को सुन रहे थे वो अभी भी हमे बस के पिछले शीशे से देखने की
कौशिश कर रहे थे....| तो दोस्तों आपको मेरी अभिव्यक्ति कैसी लगी कमेंट करके जरुर
बताना....क्योंकि आप ही सहारा हो मेरी कलम का....|
* दुनियां जाए भाड़ में
लेखक: सुखचैन
मेहरा सम्पर्क सूत्र: 9460914014

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