Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on April 14, 2018 with No comments
आसिफा तूं जिन्दा हो जा (नम आँखों की
गुजारिश)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ें*
आसिफा* तूं जिन्दा हो जा और समा जा उन दरिंदो के शरीर में जहर बनकर
| एक ऐसा जहर जो न जीने दे उन्हें और नहीं मरने | कुदादे किसी खाई में ले जाकर जहां
भेडिये पिछले कुछ महीनों से भूखे हो | और फिर तुम ऐसा करना किसी न्यायपालिका के
किसी खास अफ़सर के शरीर में प्रवेश कर जाना और अपने हिसाब से संशोधित करना जन रक्षा
के नियमों को | पर नियमों से भी कुछ नहीं होने वाला अब | अब तो तुम्हें कुछ ऑर ही
सोचना होगा | सोच कुछ ऐसा की सभी उन हवस के दानवों को ऐसा कुछ करने से पहले 100
बार सोचना पड़े | लगा दे पीछे इनके किन्हीं ईमानदार पुलिस ऑफिसरों, नेताओं व इंसाफ
के देवताओं को जो जड़ मिटा दे ऐसे अपराध.....| पर तुम अब पूछोगे कि, ‘कहाँ मिलेंगे
ऐसे लोग ..?” तो मेरा जबाव होगा कर दो पब्लिश मेरी इस गुजारिश को हर चौराहे, थाने,पोलिटिकल
दफ्तरों में व दुनियां के हर कोने
में....| अगर इन्सान होंगे तो लाजमी ही तुम्हारी कौशिश सफल होगी | ये गुजारिश मैं
तुमसे इस लिए कर रहा हूँ कि लोग मेरी नहीं सुनेंगे लेकिन तुम्हारी जरुर
सुनेगे..........क्योंकि तुम्हारे प्रति सुहानुभूति अभी ताज़ा है...जल्दी करना इस
देश के लोगों को जल्दी भूलने की बीमारी है......
लेखक: सुखचैन मेहरा सम्पर्क सूत्र: 9460914014

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