Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on January 14, 2018 with 2 comments
पतंग नहीं है बेटियां (काल्पनिक लघु-कथा)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना *
पतंग मेरी छोटी बहन का नाम है | 12 वीं की पढ़ी पूरी हो चुकी थी वह अब कॉलेज
में जाना चाहती थी लेकिन पापा ने मना कर दिया | कॉलेज घर से दूर था इसलिए | मेरी
बहन ने चुप-चाप स्वीकार भी कर लिया | लेकिन उसके चहरे पर आगे पढाई करने की चाह साफ
दिख रही थी | मेरे से रहा नहीं गया मैंने पापा को किसी न किसी तरह मना लिया लेकिन
पापा ने एक शर्त रखी कि, ‘पतंग सीधी कॉलेज जायेगी और सीधी घर आयेगी | आज मेरी बहन बहुत खुश नजर आ रही थी |
एक दिन मेरी बहन समय पर घर वापस नहीं आयी | पापा ने मुझे फ़ोन किया और मैं सीधा
कॉलेज पहुँच गया वहां जाकर देखा तो वार्षिक उत्सव का कार्यक्रम चल रहा था | मैं और मेरी बहन घर वापस आ गये | अभी घर मैं प्रवेश किया ही था कि, ‘पापा ने बहन को डांटना शुरू कर दिया’ | निर्दोष पतंग चुप-चाप खड़ी आंसू बहती रही | ये देख मैंने पापा से कहा पापा हमारी बात तो सुन लो......| लेकिन नहीं माने अभी भी डांट रहे थे| मेरी माँ ने पापा को कहा ‘ मुंडे दी गल सुनलो पेलां’ | हां दस......| मैंने सब कुछ बता दिया तब जाकर पापा को अहसास हुआ कि वह गलत थे| मैंने पापा से कहा “पापा बेटियों को पतंग की तरह मत रखो इन्हें उन्मुक्त गगन में उड़ने दो | यदि आपकी परवरिश में कोई कमीं न हुई तो ये उड़कर आपके पास ही आयेंगी | पापा ने बहन को गले लगाया और आगे पढ़ाने का वादा किया | लेखक:- सुखचैन मेहरा सम्पर्क सूत्र:- 9460914014

2 comments:
अच्छी कहानी है...
सही लिखा भाई अपने
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