January 03, 2018 Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह No comments
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व्हाट्सएप डराता है…….  (दो हास्य पंक्तिया)
      एक रात तकरीबन एक बजे मेरी अचानक मेरी आंख खुल गयी | फिर मेरी नज़र मेरे पास मेज पर पड़े मोबाइल की टिम-टिमाती नीली बत्ती पर पड़ी | मैंने मोबाइल का लोक खोल देखा तो व्हाट्सएप पर एक सन्देश आया हुआ था | मैंने व्हाट्सएप खोला तो उसमे आए सन्देश(चुटकले) को पढ़ कर मेरी जोर से हंसी छुट गयी| मेरे मम्मी-पापा उठ खड़े हुए ये देख मैने मेरा मोबाइल मेरे बिस्तर में ही रख दिया और चुप-चाप सो गया | मेरे मम्मी-पापा ने मुझे दो-तीन आवाजें तो लगाई लेकिन मैंने कोई जबाव नहीं दिया | पापा ने मेरी मां से  कहा “नींद च बोल्या है मुंडा, तुसीं सो जायो” | ये सुन मेरी दोबारा जोर से हंसी न चाहते हुए भी छुट गयी | मेरे मम्मी-पापा दोनों थोड़ा डर गये थे कि लड़के क्या हो गया और मुझे “सुखचैन........सुखचैन......पुत.....” जगाने की कौशिश करने लगे (जबकि मैं तो पहले से ही जगा हुआ था)| मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था, मेरी हंसी रुक ही नहीं रही थी मैं उन्हें अपने हाथ मारकर शांत करना चाहा तो वे डर के मारे पीछे हट रहे थे|फिर मैंने अपनी मां के हाथ को पकड़कर कहा कि ‘ मां, मैं सुखचैन ही हां’| फिर वे शांत हुए तो मैंने सारी बात बता दी, मम्मी-पापा दोनों भी हंस पड़े| लेकिन उस दिन के बाद आज तक पापा सोने से पहले मेरा मोबाइल सिर्फ इसलिए अपने पास रख लेते है कि उन्हें फिर कभी ऐसे वाक्य का सामना न करना पड़े | ये वाक्य अभी भी मुझे कहीं भी हंसा देता है|
                                              लेखक:- सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र:- 9460914014

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