Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on March 25, 2018 with No comments
खास लग रहे हो (प्यार की एक तड़फ)
*दो मिनट का समय निकालकर जरुर पढ़ना*
लड़का : आज तो तुम बहुत खास लग रहे हो
दूर होकर भी कितने पास लग रहे हो |
सांस ही निकल जाते, गर ये ख्वाब न होता
इतनी वास्तविकता का अहसास लग रहे हो ||
लड़की : पापा की पगड़ी, भाई की इज्जत और जमाने का डर
गर न होता तो मेरा
तेरी जान पर बनना लाजमी था |
क्या बताऊँ दिल मेरा
भी नहीं लगता अब बिन तेरे
मगर ये कहना भी मेरे
लिए बड़ा नाजमी(शर्म युक्त) था ||
लड़का : हा....क्या तारीफ़ करूं खुदा की या तेरी तुम
से
उफ्फ्फ..बोला भी नही जा रहा अब कुछ मुझ
से |
दूर रहकर भी सांसे अटका दी तुमने मेरी
मेरे
होने वाले हमसफ़र की अथाह्स लग रहे हो ||
लड़की
: बस कर अब अकेले ही मुस्करा रही हूँ, शक
हो जायेगा
हमारे बड़ों को परवाह
जो है हमारी, पर मना लेगे.. इतने |
बे समझ भी नही
हमारे बड़े, बस तुम अब सांसे खरीद लो
रोज एक सांस
निकालूंगी, बिताऊंगी लम्हे तेरे साथ इतने||
लेखक: सुखचैन मेहरा, सम्पर्क सूत्र:- 9460914014

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