Posted by कलमरथ हिंदी साहित्य समूह on August 21, 2017 with 9 comments
नोटः- यह कहानी एक ऐसी बच्ची की है,जिसे उसकी माँं के द्वारा अपने सांस-ससुर के कहने पर जन्म से पहले ही मार देने की साजिश रची गई, लेकिन उस बच्ची के मामा नें उस बच्ची को एक नया जीवन दान दे दिया। यह कहानी चार भागों विभाजित है।
गुंजन भाग - एक
यह कहानी एक ऐसी बच्ची की है,जिसे उसकी माँं के द्वारा अपने सांस-ससुर के कहने पर इस बच्ची को जन्म से पहले ही मार देने की साजिष रची गई, लेकिन उस बच्ची के मामा नें उस बच्ची को एक नया जीवन दान दे दिया।
गुंजन एक तीन-चार साल की बहुत ही प्यारी बच्ची थी। वह हमेषा कुछ न कुछ करती रहती थी। कभी अपने दादा के इधर-उधर बिखरे पड़े जूतों को उनकी सही जगह पर रख देती, तो कभी अपनी माँ के साथ अपने नन्हें-नन्हें हाथों से आँगन में झाड़ू लगाती।
एक बार गुंजन घर के बाहर बगीचे में खेल रही थी, तभी उसकी नजर अपने सामने वाले घर की खिड़की पर पड़ी, जहाँ उसने कुछ पक्षियों को अलग-अलग पिजरों में बन्द किया हुआ देखा। गुंजन कभी खुुले आसमान में उड़ते पक्षियों को देखती, तो कभी उन पिंजरों में बन्द पक्षियों को। वह भागकर अन्दर अपनी माँ के पास गई और बोली, “ माँ.....माँ देखो, सामने वाले घर में एक अंकल ने तोतो और चीड़ियों को पिजरों में बन्द कर रखा है। वह उन पक्षियों को उड़ने नहीं देते ।” गुंजन की माँ उसे समझाती है कि “नहीं बेटा वह अंकल उन पक्षियो को बेचने के लिए पिजरों में बन्द करके रखते है। यही उनका काम है ।”
गुंजन ने अपनी माँ से कहा की, ' माँ मेरे दादा जी तो पक्षियों को पिंजरों में बंद करके नहीं रखते, वह भी तो काम करते है। गुंजन के इस बचकाने तर्क ने उसकी माँ को निरुत्तर कर दिया।
गुंजन खास लहजे के साथ बोली, “नहीं माँ उनको बोलो कि उन पक्षियों को खुला छोड़ने के लिए।” गुंजन की माँ ने फिर उसे समझाया, कि ये व्यापारी लोग है हमारा कहना नहीं मानेगे। फिर वह उन पिंजरे में बंद पक्षियों की ओर देखते हुए मन महसोस कर रह गई।
फिर एक दिन सामने वाले पड़ौसियों का लड़का उनके बगीचे में बाकि बच्चों के साथ खेल रहा था। गुंजन दौड़कर उस लड़के की तरफ गई और पूछा- कहां रहते हो तुम ? क्या नाम है तुम्हारा, पहले तो कभी नहीं देखा तुम्हें यहां। लड़का एक क्षण तो गुंजन के मुंह की तरफ देखना लगा कि एक साथ इतने सवाल! फिर वह आंखे जपकाते हुऐ अपने घर की तरफ ईशारा करते हुए बोला- मैं वो सामने वाले घर में रहता हूँ मेरा नाम राजू है और मेरे मम्मी-पापा मुझे यहाँ खेलने के लिए छोड़ कर बाजार गए है।
राजू तू मेरा एक काम करेगा क्या ? गुंजन ने पूछा।
क्या काम ? राजू ने पूछा।
तू उन पक्षियों के पिंजरों से बाहर निकाल दे -
अरे ! नहीं मेरे पापा मुझे डांटेगें।
चल मैं खोल देती हूँ ,तुम मेरा नाम लगा देना।
ठीक है।
दोनों दौड़कर राजू के घर पहुंचते है। गुंजन अभी एक ही पिंजरे का दरवाजा खोलती है। ( पक्षी खुले आकाश में उड़ जाते है। उन्हें उड़ता देखकर गुंजन खुशी के मरे ताली मारने लगती है।) इतने में राजू के मम्मी-पापा वहाँ आ जाते हैं। पिजरें का दरवाजा खुला देखकर राजू के पापा ने गुस्से से पूछा कि पिंजरे का दरवाजा किसने खोला ? राजू डर के मारे कुछ नहीं बोला। गंुजन ने झट से थोड़ा आगे बढ़कर जबाब दिया कि पिंजरे का दरवाजा मैंने खोला है, अंकल। राजू के पापा गुंजन को एक चांटा लगा देते है।गुंजन का सिर पास ही पड़े एक पत्थर से टकरा जाता है। गुंजन जोर-जोर से रोने लगती हैं।
गुंजन की मां बाहर बालकनी में कपड़े सूखा रही होती है, तभी उसे गुंजन के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है। गुंजन की मां कपड़ों को वहीं रख बगीचे में खेल रहे बच्चों की ओर दौड़कर जाती है। वहीं से उनको पता चलता है कि, गुंजन समाने बाले घर में गई है। गुंजन की मां सामने बाले घर पहुँचती है।
गुंजन का सिर दिवार से टकराने के कारण सिर से लहू वहनें लगता है। गुंजन की मां यह सब देखकर घबरा गई। जाती है। फिर थोडा होश में आकर तुरन्त हस्तपताल मे डाॅक्टर के पास ले जाती है।
डाॅक्टर ने प्राथमिक उपचार करने के बाद घाव गहरा होने के कारण गुंजन को एक-दो दिन यहीं भर्ती रहने को कहता है। गुंजन की मां ने ऐसा ही किया।
जब राजु के पापा को अपनी गलती का एहसास होता है तो माफी मांगने गुंजन के घर पहुँचता है। यहां से उन्हें पता चलता है कि गुंजन तो हस्तपताल में भर्ती है तो वह रिक्सा पकड़ हस्तपताल पहुँचता है।
जब राजू के पापा हस्तपताल में पहुँचते है तो गुंजन की मां उन्हें यहा चले जाने को कहती है।
राजु के पापा गुंजन की ओर बढ़ते हुए कहते है कि, “बेटा मुझे माफ कर दो बेटी मेैं आगे से कभी किसी पक्षी को पिंजरों में बंद करके नहीं रखुंगा।
“ मै कोई दूसरा काम कर लुंगा लेकिन इन बेजूबान पक्षियों को कभी कैद में नहीं रखुंगा।”
“ पक्का अंकल ?”
“हां, बेटी पक्का।” राजू के पापा की आँखों से आंसू आ जाते है।
राजू के पापा की आँखों में आंसू देख, गुंजन कहती है, यदि आपने ऐसा दोबारा किया तो मैं फिर पिंजरे खोल दूगीं । फिर चाहे थप्पड़ पडे तो पडे।
सब लोग गुंजन की बात सुनकर हंस पडते है।
“अरे! नहीं बेटा आगे से ऐसा कभी नहीं करूँगा।
“मुझे तुम पर गर्व है, बेटी।” गुंजन की मां बोली
“ लेकिन, मां तुम्हे तो बेटा चाहिये था ना मां, तो फिर आज क्यों गर्व कर रही है ? ” अगर मेरे मामा ना होते तो आप सब लोग मिलकर मुझे जन्म से पहले ही मार देते। ह ना मां ?
यह बात सुनकर गुंजन की मां सिर्फ बोल सकी कि, ‘बेटा, मैं मजबूर थी उस वक्त।
इस बीच राजू और उसकी मां कुछ फल और गुब्बारे लेकर यहां हस्तपताल पहुंचे। यह देख गुंजन कहने लगी कि, “ये बडे़ वाला गुब्बारा मेैं लुंगी और ये फल भी खाऊंगी।
सब लोग गुंजन की इस हरकत को देख हंस पडे़। अब डाॅक्टर की ओर से भी छुट्टी मिल गयी थी। सब लोग हसी- ख़ुशी घर चले गये ।
शिक्षा : पक्षियों की उड़ान और बेटियों की मुस्कान को छिनने का अधिकार किसी को भी नहीं है, किसी को भी नहीं। लेखकः सुखचैन मेहरा , सम्पर्क सूत्र:- 9460914014
इस प्रकार गुंजन ने तो अपना कर्तव्य पुरा कर दिया उन पक्षियों को छुुड़ाकर लेकिन आज भी हमारी बेटीयां उन पक्षियों की तरह घर में सिर्फ इसलिए कैद है कि उन्हें पढ़ने भेजने के लिए घर के पास कोई स्कूल नहीं है। बेटियों का पढ़ पाना सिर्फ स्कुल घर के नजदीक होने पर निर्भर करता है। ऐसा नहीं होना चाहिये।
(आपको यह कहानी कैसी लगी टिप्पणी के द्वारा जरुर बताएं ।) अगला भाग अगली पोस्ट में

9 comments:
Very Good Story!
Very nice story. Please send the second part of this story..........I am very exited
Oh! Coming soon......
Thanks Rajiv. I will send second part of this story soon...
Good Story! Second Part??????
Kuchh Khas Nahi....
बहुत अच्छी कहानी है भाई दूसरा भाग भी लयो ना जल्दी
कृपया कुछ दिन प्रतीक्षा करें
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